स्वास्थ्य

स्क्रीन टाइम बच्चों के ओवरऑल विकास पर असर कैसे पड़ रहा है?

शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, व्यावहारिक और ज्ञान संबंधी विकास (संज्ञानात्मक विकास) के मुद्दे पर आमतौर पर इस सवाल से जुड़ते हैं कि बच्चे कितने समय स्क्रीन के सामने (स्क्रीन समय) और किस तरह बिताते हैं। सामान्य तौर पर बच्चे अपने आसपास के वातावरण से सीखते हैं और बड़ों, विशेष रूप से पैरों के व्यवहार (माता-पिता सेट उदाहरण) से। अव्वल तो स्क्रीन टाइम का नुकसान यही होता है कि बच्चे के आसपास के परिवेश से कट जाते हैं और उनकी गतिविधियों के व बर्ताव स्क्रीन पर देखे गए प्रदर्शन (वर्चुअल सामग्री) से प्रेरित होने लगते हैं, वास्तविक जीवन से नहीं। विज्ञान ने इस बारे में कई तरह से अध्ययन किया है।

सामान्य शब्दों में समझें तो एक बच्चा अगर ज्यादा समय क्लास वर्ल्ड यानी स्क्रीन के सामने बिताता है तो वह खेलकूद, व्यायाम, लोगों से मिलने, बातचीत करने और जीवन में काम आने वाली स्किल्स सीखने के लिए समय कम करता जाता है, जिससे उसका ओवरडल विकास होता है। Inf होता है। साइंटिफिक स्टडीज़ को भी जान जाएगी, लेकिन पहले किस तरह विकास Inf होता है, ये देखते हैं।

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भाषा पर असर: भाषा परिवार और समाज से हासिल होने वाली चीज़ है, जिसमें ज्ञान और बहुत तरीकों की जानकारी भी शामिल होती है। लेकिन स्क्रीन टाइम भाषा की समझ और भाषा के बरतने के तरीकों को प्रभावित करता है। भाषा के इस्तेमाल के वक्त चेहरे के हाव भाव और बॉडी लैंग्वेज भी स्क्रीन के प्रदर्शन से प्रभावित होता है। स्टडीज़ ये भी कहा गया है कि ज़्यादा स्क्रीन टाइम वाले बच्चों में पढ़ने की कम इच्छा और ध्यान न लगने की समस्या होती है।

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बढ़ते बच्चों के स्क्रीन टाइम पर पैरेंट्स को निगरानी रखना चाहिए।

नींद पर असर: स्क्रीन से निकलने वाली किरणें और विशेष रूप से ब्लू लाइट से नींद से जुड़ी समस्याएं होती हैं क्योंकि स्लीप हॉर्मोन मेलाटॉनिन के रिसने में रुकावट होती है। धीरे धीरे यह इस्तेमाल किया या समस्या कॉग्निटिव डेवलपमेंट को बाधित करता है। शिशुओं से लेकर बढ़ते बच्चों तक यह समस्या देखी जा रही है।

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इमोशन पर असर: कई तरह से बच्चे के इमोशनल बर्ताव इन्फ होते हैं। डिजिटल मीडिया से बच्चे की कल्पना और मोटिवेशन लेवल इन्फ होता है। बच्चों में इरिटेशन, फ्रस्ट्रेशन, चिंता और इंपल्सिव डिसॉर्डर्स भी स्क्रीन टाइम के नतीजों के तौर पर देखे जा रहे हैं। ये भी होता है कि बच्चे बोलने के सामान्य उतार-चढ़ाव और असली एक्सप्रेशनों को समझने नहीं पाते हैं और वास्तविक दुनिया में वे ठीक से समुदायीकरण और व्यक्ति की समझ बनाने में नाकाम रहते हैं।

क्यों होता है ये निगेटिव असर
वीडियो में बहुत तेजी के साथ दौड़ती तस्वीरें और साथ ही रंग भी अपना असर छोड़ते हैं। ज़्यादा स्क्रीन टाइम से आंखें और दिमाग एक तरह से आदी हो जाते हैं और दूसरे अर्थ में कुंद होने लगते हैं। स्वास्थ्य अनुसंधान के शोधकर्ताओं ने एबीसीडी यानी एडोलसेंट ब्रेन कॉउनिथिव को बताया संशोधन स्टडी खास दो खास बातें नोट कीं:

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* जिन बच्चों का स्मार्टफोन, टैबलेट और वीडियो गेम आदि का टाइम दिन में सात घंटे या उससे ज्यादा था, उनके एमआरआई स्कैन में देखा गया कि ब्रेन के कुछ हिस्सों में नॉर्मल ब्रेन से काफी अंतर था।
* एक दिन में दो घंटे से ज़्यादा के स्क्रीन टाइम वाले बच्चों को रिसर्चरों ने भाषा और सोच विचार से जुड़े जो टेस्ट दिए थे, उनमें उन्होंने कम स्कोर किया, बजाय उन बच्चों के जिनका स्क्रीन टाइम कम था।

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टीज़ से पहले दो घंटे का स्क्रीन टाइम सही कॉंटेंट के साथ ठीक माना गया है।

तो इसका हल क्या है?
‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ का सूत्रूला यहाँ भी पाते हैं और पैरेंट्स अपने बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित करने के साथ ही, यह भी ध्यान रखें कि स्क्रीन पर किस तरह के कॉंटेंट से बच्चे रूबरू होते हैं। संभव हो तो बच्चे के स्क्रीन टाइम के दौरान आप शामिल रहें और कॉंटेंट को सही समझ देने से संबंधित बातचीत करें। कैनेडा में कैलगैरी विश्वविद्यालय में मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञ शेरी मैकिनगन की बात : समझ

जिन बच्चों का स्क्रीन टाइम ज़्यादा रहा, उनका विकास देर से देखा गया। हमें रिसर्च में पता चला कि लगभग दो से तीन घंटे एक औसत समय है, जो बच्चे स्क्रीन के सामने बिता रहे हैं, लेकिन बा ल चिकित्सा की एकेडमी के हिसाब से 5 साल के बच्चों तक के लिए एक घंटे से ज्यादा स्क्रीन समय नहीं होना चाहिए। चाहिए।

विशेषज्ञ कहते हैं कि बढ़ते बच्चों के लिए आप स्क्रीन टाइम को एजुकेशनल प्रोग्राम के साथ अगर जोड़ते हैं तो यह सबसे अच्छा होता है। टीज़ से कम उम्र तक दो घंटे तक का क्वालिटी स्क्रीन टाइम विशेषज्ञ आसानी से हैं। ये खयाल भी रखें कि स्क्रीन टाइम के साथ पूर्वी टाइम के बीच संतुलन बनाएं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं फैमिली टाइम, बेड्रीन और खाने के वक्त स्क्रीन से बच्चे दूर रहें इसलिए पैरेंट्स को इस समय में स्क्रीन नहीं देखना चाहिए।




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