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डीएनए: क्या भारत में वैक्सीन की कमी को दूर करने के लिए कोरोना वैक्सीन पेटेंट-फ्री फॉर्मूला काम करेगा? | डीएनए विश्लेषण: क्या कोरोना वैक्सीन ‘पेटेंट मुक्त’ करने से खत्म हो जाएगा?

नई दिल्ली: भारत में कोरोना वैक्सीन (कोरोना वैक्सीन) की कमी का संकट कैसे समाप्त हो सकता है? इस समय चारों ओर एक ही सवाल चर्चा में है और वो ये कि वैक्सीन नहीं है, और ये इसलिए नहीं है क्योंकि इसका उत्पादन करने वाली कंपनियां सिर्फ दो ही हैं। यानी दो कंपनियों को 135 करोड़ लोगों के लिए वैक्सीन की 270 करोड़ डोज उपलब्ध करानी है। ये काम बहुत मुश्किल है और यही कारण है कि अब तक कई राज्यों में 18 साल से 44 साल तक की उम्र के लोगों को वैक्सीन लगनी शुरू नहीं हुई है। जिन राज्यों में ऐसा हो भी रहा है, वहाँ अभियान काफी सीमित है।

उदाहरण के लिए आप देश की राजधानी दिल्ली की स्थिति को समझिए। दिल्ली में 18 साल से ऊपर के 90 लाख लोगों को वैक्सीन की दो डोज लगनी हैं, यानी कुल 1 करोड़ 80 लाख डोज चाहिए। लेकिन दिल्ली सरकार के पास इतना डोज ही नहीं है। इसी का नतीजा है कि दिल्ली में आज से 18 साल से ऊपर के लोगों को वैक्सीन लगनी तो शुरू हो गई है, लेकिन कुल वैक्सीनेशन सेंटर्स की संख्या सिर्फ 77 ही रखी गई है। जबकि वैक्सीन लगानी में 90 लाख लोग हैं। आप कह सकते हैं कि ये एक लॉटरी की तरह है। पंक्ति में तो कई सारे लोग खड़े हैं लेकिन भाग्यशाली वही है, जिसे वैक्सीन के लिए ऑनलाइन अपॉइंटमेंट मिल गया है।

डर बढ़ाना वैक्सीन की धीमी गति

यही स्थिति दूसरे राज्यों की भी है, और प्राथमिक अस्पतालों में हर रोज 200 से 500 लोगों को ही डोज लगाई जा रही हैं। अब अगर वैक्सीनेशन इसी स्पीड से चला गया तो इस साल के अंत तक देश की 30 प्रतिशत आबादी को भी वैक्सीन नहीं लग पाएगी। इसलिए अब हम कुछ ऐसी बातें आपको बताएंगे, जिन पर अमल द्वारा इस संकट को समाप्त किया जा सकता है। ये सब हम आपको बहुत सरल भाषा में बताएंगे और हम चाहते हैं कि आप इसे सोशल मीडिया पर बहुत अधिक से अधिक शेयर करें।

वैक्सीन की कमी का संकट क्यों पैदा हुआ?

इस परिस्थिति की दो प्रमुख वजह हैं, पहला है देश की आबादी, जो 135 करोड़ है, और दूसरी वजह वैक्सीन का सीमित उत्पादन है। इस समय भारत में दो वैक्सीन का उत्पादन हो रहा है। पहला है कोविशील्ड (कोविशिल्ड), जिसका निर्माण सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) कर रहा है। जबकि दूसरे में कोविक्सीन (को-वैक्सिन) है, जिसे हयाबाद की भारत बायोटेक (भारत बायोटेक) कंपनी द्वारा बनाया गया है। आपको फिर से बता दें कि सिर्फ दो कंपनियों में भारत में वैक्सीन बना रही हैं। जबकि हजारों कंपनियां इस काम में जुट सकती हैं। वह कैसे, अब आप इसे कुछ आंकड़ों से समझते हैं।

3 हजार में से सिर्फ 2 कंपनियां बनी वैक्सीन

भारत में कुल 3 हजार फार्मास्युटिकल कंपनियां हैं, जिनकी देशभर में साढ़े 10 हजार मैन्युफैक्चरिंग यूनिट हैं। इन सभी कंपनियों की कुल वेल्यू 2 लाख 19 हजार करोड़ रुपये है। सरल शब्दों में कहें तो हमारे देश में 3 हजार कंपनियां अपनी साढ़े 10 हजार मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में वैक्सीन का निर्माण कर सकती हैं। लेकिन अभी तक सिर्फ दो ही कर रहे हैं और बाकी की 2 हजार 998 कंपनियां वैक्सीन के उत्पादन में देश की कोई मदद नहीं कर पा रही हैं।

वैक्सीन को पेटेंट फ्री करना होगा

अब अगर इनमें से एक हजार कंपनियां भी वैक्सीन का उत्पादन करती हैं तो देश में वैक्सीन की कमी ही नहीं होगी। लेकिन आप सोच रहे होंगे कि ये आखिर होगा कैसे? तो इसके लिए वैक्सीन को पेटेंट फ्री करना होगा। यानी वैक्सीन बनाने का फॉर्मूला क्या है, ये उसे विकसित करने वाली कंपनी, दूसरी कंपनियों के साथ शेयर करे और केंद्र सरकार इन कंपनियों को वैक्सीन बनाने का अधिकार दे।

सरकार ऐसा कैसे कर सकती है?

द पेटेंट एक्ट, 1970 के सेक्शन 92 में लिखा है कि सरकार 3 परिस्थितियों में किसी भी वस्तु, उपकरण और दवाइयों को पेटेंट मुक्त कर सकती है।
1. यदि देश गम्भीर विशेषाधिकार से गुजर रहा है।
2. यदि कोई वस्तु, उपकरण या वैक्सीन इतनी आवश्यक है कि इसकी कमी से किसी की जान को खतरा है।
3. अगर ये लोगों के हित में है।
यानी मौजूदा हालात इन तीनों शर्तों को पूरा करते हैं। भारत में औसतन हर दिन कोरोनावायरस से तीन हजार लोगों की मौत हो रही है। यानी वैक्सीन की सख्त जरूरत इस समय देश को है। इसके लिए आवश्यक है कि वैक्सीन को पेटेंट मुक्त किया जाएगा। हालांकि कुछ परेशानियों में भी शामिल है।

कोविशील्ड का पेटेंट सरकार के हाथ में नहीं

केंद्र सरकार इस कानून के तहत भारत बायोटेक की कोविक्सीन का निर्माण करने के लिए तो दूसरी कंपनियों को कंपलसरी लाइसेंस जारी कर रही है। लेकिन कोविशील्ड के मामले में ये फैसला प्रभावी नहीं होगा। क्योंकि इस वैक्सीन का पेटेंट ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और एस्ट्राजेनेका कंपनी के पास है।

ऐसा करने वाला पहला देश भारत है

भारत दुनिया का पहला ऐसा देश है, जो कोरोना वैक्सीन (कोरोना वैक्सीन) से पेटेंट (पेटेंट) हटाने की मांग की। इसके लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को भी प्रस्ताव भेजा गया, लेकिन अब तक इस पर कोई फैसला नहीं हो सका है। इसके अलावा भारत और दक्षिण अफ्रीका ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) में वैक्सीन पेटेंट की छूट के लिए नए सिरे से कोशिश शुरू की है, और अब WTO से उम्मीदें बढ़ गई हैं।

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